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अध्याय 18 — मोक्ष संन्यास योग

श्लोक 45-46
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।

स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।45।।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्विमदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।46।।

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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