भाषा चुनें:

अध्याय 11 — विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 47
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

॥ श्री भगवानुवाच ॥

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।

तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥47 ॥

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


Gita Prerna Logo
Go Back Top