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अध्याय 11 — विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 45
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

अदृष्टपूर्व हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।

तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ 45 ॥

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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