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अध्याय 11 — विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 31
🕉 मूल संस्कृत श्लोक

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥31॥

🕉 हिन्दी अनुवाद


📜 अनुवाद हिन्दी


💬 व्याख्या हिन्दी


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