अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥
तब दुर्योधन बोला महारथियों से,
जगह अपनी अपनी पे होके खड़े।
पितामह भीष्म की रक्षा करो,
चहुं ओर से नजर उनपे धरो ॥
इसलिए आप सबके सब लोग सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से स्थित रहते हुए निश्चित रूप से पितामह भीष्म की चारों ओर से रक्षा करें।
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अब तक बात आचार्य द्रोण की थी। लेकिन यहाँ दुर्योधन ने पितामह भीष्म के लिए एक बात में कई संकेत कर दिए। यह तो था ही कि यदि शिखण्डी युद्ध में पितामह के समक्ष आ गया तो वे युद्ध नहीं करेंगे। शस्त्र का प्रयोग उसके समक्ष नहीं करेंगे। इसलिए चारों ओर से उनकी रक्षा की बात। लेकिन पितामह तो सक्षम हैं, सेनापति हैं। उनकी रक्षा...! कुछ अटपटी-सी बात भी लगती है। दुर्योधन में कपट वृत्ति तो है ही। ऐसा भी लगता है कि वह बड़ी चतुराई से यह इशारा कर रहा है कि पितामह उसी के पक्ष में ही रहें। ऐसा है या नहीं- यह ध्यान रखा जाए- कुछ भी हो। दुर्योधन आचार्य द्रोण और पितामह भीष्म को समर्पित भाव से अपने पक्ष में रखने हेतु बार-बार उकसाता है। अब तक भी द्रोणाचार्य कुछ नहीं बोले और न ही कोई विशेष भाव ही प्रगट किया। दुर्योधन प्रारम्भ में ही हतोत्साहित न हो जाए, इसलिए पितामह भीष्म की प्रतिक्रिया-